जन-गण-मन अधिनायक जय हे,
भारत भाग्य विधाता।
पंजाब सिंध गुजरात मराठा,
द्राविड़ उत्कल बंग।
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा,
उच्छल जलधि तरंग।
तव शुभ नामे जागे,
तव शुभ आशीष मांगे।
गाहे तव जय गाथा।
जन-गण-मंगलदायक जय हे,
भारत भाग्य विधाता।
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे।

वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलयज-शीतलाम्
शस्य-श्यामलां मातरम्। वंदे मातरम्।
शुभ्र-ज्योत्स्ना-पुलकित-यामिनीम् ॥
फुल्ल-कुसुमित-द्रुमदल-शोभिनीम्
सुहासिनी सुमधुर-भाषिणी
सुखदां वरदां मातरम् ॥ वंदे मातरम्।

ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।

या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ॥ १ ॥

शुक्लां ब्रह्म विचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनी।
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥ २ ॥

हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी अंब विमल मति दे,
अंब विमल मति दे,
जग शिरमौर बनायें भारत, वह बल विक्रम दे।
अंब विमल मति दे।

साहस शील हृदय में भर दे, जीवन त्याग तपोमय कर दे,
संयम सत्य स्नेह का वर दे, स्वाभिमान भर दे ॥ १ ॥

हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी, अंब विमल मति दे।

लव, कुश, ध्रुव, प्रह्लाद बनें हम, मानवता का त्रास हरें हम,
सीता, सावित्री, दुर्गा मां, फिर घर-घर भर दे ॥ २ ॥

हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी अंब विमल मति दे।